यूपी प्राइवेट बिज़नेस पार्क डेवलपमेंट स्कीम 2025: पूरी गाइड
पॉलिसी क्या है?
UP Private Business Park Development Scheme, 2025 की घोषणा 24 मार्च 2026 को Nivesh Mitra 3.0 और UP Plug & Play Industrial Shed Policy के साथ हुई — फ्रेमवर्क खुद राज्य के फरवरी 2026 पॉलिसी रिलीज़ में विस्तृत किया गया था। यह Infrastructure व Industrial Development विभाग के अंतर्गत, राज्य के Industrial Development Authorities (IDAs) के ज़रिए चलती है।
यह इंडस्ट्रियल शेड पॉलिसी से कैसे अलग है?
दोनों सरकारी ज़मीन पर एक जैसा DBFOT (Design-Build-Finance-Operate-Transfer) मॉडल इस्तेमाल करते हैं, लेकिन यह खासतौर पर Grade-A ऑफिस स्पेस के लिए है — टेक्नोलॉजी कंपनियां, Global Capability Centres (GCC), बिज़नेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग यूनिट, रिसर्च फैसिलिटी, और अन्य नॉलेज-इंटेंसिव सर्विस बिज़नेस। यह फैक्ट्री या वेयरहाउसिंग के लिए नहीं है।
डेवलपर को क्या मिलता है
ध्यान दें, चुने गए डेवलपर को कोई पारंपरिक कैपिटल सब्सिडी, एन्युटी, या गारंटीड सरकारी भुगतान नहीं मिलता। इसके बजाय उन्हें पब्लिक ज़मीन पर पार्क बनाने और कमर्शियली संचालित करने का कॉन्ट्रैक्चुअल अधिकार मिलता है, शेयर्ड-रिस्क रेवेन्यू मॉडल के तहत। क्योंकि भुगतान ऑक्युपेंसी से जुड़ा है, डेवलपर के पास टेनेंसी अधिकतम करने का सीधा प्रोत्साहन है।
| कौन | भूमिका / लाभ |
|---|---|
| सरकार (IDA) | ज़मीन का मालिक; RFP के ज़रिए डेवलपर चुनती है |
| प्राइवेट डेवलपर | पार्क को डिज़ाइन, निर्माण, फाइनेंस, संचालन, और रखरखाव करता है — रेवेन्यू ऑक्युपेंसी से जुड़ा, तय सरकारी भुगतान नहीं |
| किरायेदार कंपनी | डिजिटल कनेक्टिविटी, यूटिलिटीज़, और कॉमन सर्विसेज़ के साथ रेडी प्लग-एंड-प्ले ऑफिस इकोसिस्टम |
यह किसके लिए है
- डेवलपर: प्राइवेट इंडस्ट्रियल व कमर्शियल पार्क डेवलपर, REITs, इंफ्रास्ट्रक्चर फंड, और दीर्घकालिक इंस्टीट्यूशनल निवेशक
- किरायेदार: टेक्नोलॉजी कंपनियां, GCC, BPO यूनिट, रिसर्च फैसिलिटी, और अन्य नॉलेज-इंटेंसिव सर्विस बिज़नेस
क्या किरायेदारों को अभी भी सेक्टरल इंसेंटिव मिलते हैं?
हां — किरायेदार कंपनियां रेडी-बिल्ट स्पेस के अलावा GCC पॉलिसी, IT व ITeS पॉलिसी, और इलेक्ट्रॉनिक्स पॉलिसी जैसी अन्य UP सेक्टरल पॉलिसी के तहत अलग से पात्र रहती हैं।
प्रक्रिया क्या है?
सरकार द्वारा ज़मीन चयन → फीज़िबिलिटी स्टडी → Request for Proposal (RFP) → टेक्निकल व फाइनेंशियल बिड → डेवलपर चयन → कंसेशन एग्रीमेंट → निर्माण → योग्य कंपनियों को लीज़िंग।
किराया कैसे तय होता है?
दरें संबंधित प्राधिकरण द्वारा तय की जाती हैं और RFP व कंसेशन एग्रीमेंट में बताई जाती हैं — ये पॉलिसी में खुद तय नहीं हैं।
यह किस समस्या को हल करती है?
बिखरा हुआ ऑफिस इंफ्रास्ट्रक्चर, विकास में देरी, और ज़्यादा स्थापना लागत ने राज्य की मल्टीनेशनल और हाई-वैल्यू सर्विसेज़ निवेश आकर्षित करने की क्षमता कमज़ोर की है। यह स्कीम निवेश निर्णय और वास्तविक ऑपरेशन शुरू होने के बीच का अंतर कम करती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या यह Plug & Play Industrial Shed Policy जैसी ही है?
नहीं — दोनों सरकारी ज़मीन पर एक जैसा DBFOT मॉडल इस्तेमाल करते हैं, लेकिन Industrial Shed Policy फैक्ट्री/मैन्युफैक्चरिंग के लिए है, जबकि यह स्कीम खासतौर पर GCC/IT/BPO/रिसर्च किरायेदारों के लिए Grade-A ऑफिस स्पेस के लिए है।
यह नोएडा और ग्रेटर नोएडा के लिए इतनी मायने क्यों रखती है?
इस ज़िले में GCC आकर्षण की मुख्य बाधा Grade-A ऑफिस सप्लाई है, और यह स्कीम उस सप्लाई को बनाने का राज्य का मुख्य साधन है।
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आधिकारिक पोर्टल: niveshmitra.up.gov.in अंतिम समीक्षा: अगस्त 2026
यह पेज सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्कीम जानकारी का सार है। आवेदन करने या क्लेम फाइल करने से पहले, मौजूदा आधिकारिक अधिसूचना, आवेदन फॉर्म और सटीक पात्रता शर्तें हमेशा ऊपर दिए पोर्टल पर जाकर पुष्टि करें।